आप देश में वैदेहीनंदन वेदांतजी के रूप में जाने जाते हैं। वैदेहीनंदनजी इस देश के पहले ऐसे बाल-व्यास हैं जो देशभर में श्रीजानकी-कथा का वाचन करते हैं। आप श्रीमहालक्ष्मी-स्वरूपा मां जानकीजी के अनन्य उपासक हैं।
आप पर बहुत ही अल्प-आयु से ही श्रीजानकीजी की विशेष कृपा रही है। मानो ऐसा प्रतीत हो रहा हो कि प्रभु श्रीराघव सरकार एवं मां जानकीजी ने अपनी विशेष कृपा से उन्हें गढ़ा हो। यही कारण रहा कि 7 वर्ष की आयु में ही वैदेहीनंदनजी को सुंदरकांड कंठस्थ हो गया। ढेरों पत्र-पत्रिकाओं एवं मीडिया घरानों ने उन्हें कवर भी किया।
आपके गुरु श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी सांदीपेंद्र जी महाराज हैं जो मध्य प्रदेश में मां बगलामुखी मंदिर प्रांगण के प्रमुख संत हैं।
वैदेहीनंदन वेदांतजी इतनी कम आयु में ही सनातन विषयों, कविता लेखन, संस्कृत-भाषा और माँ सीता के जीवन-आदर्शों पर गूढ़ अध्ययन रखते हैं।
उन्होंने अपने गुरु के मार्गदर्शन में माँ जानकीजी को समर्पित पांच प्रमुख पुस्तकें पूर्ण की हैं— 1. ‘श्रीभगवती सीताजी- प्राकट्य-रहस्यम’, 2. अवतार रहस्यः कमला से किशोरी तक 3. ‘श्रीसीतारामः विवाह-उत्सव’, 4. ‘महाशक्ति सीताजी’, 5. मैथिली और मिथिला। इसके अलावा तीन अन्य पुस्तकों में से एक पद्य पुस्तक ‘वेदांत पुष्प’ की रचना की है। देवभाषा संस्कृत भाषा के शिक्षण-प्रशिक्षण हेतु ‘आइए देवभाषा सीखें’ लिखी है और बच्चों में संस्कार के संवर्धन के लिए ‘मानस में बाल-संस्कार’ पुस्तक का लेखन किया है।